अमरीकी विदेशमंत्रालय में ईरानी मामलों के प्रभारी ब्रायन हूक ने कुछ हफ्तों पहले ईरान के खिलाफ अमरीकी नीतियों को सही ठहराने के लिए ईरान के खिलाफ एक बार फिर " शिया हिलाल " का शब्द प्रयोग किया जो वास्तव में पुराना हथकंडा है।
ब्रायन हूक ने सऊदी अरब की आरामको कंपनी पर हमले का ईरान पर आरोप लगाया और कहा कि काफी समय तक यह कहा जाता रहा है कि ईरान, शिया हिलाल बनाना चाह रहा है लेकिन अब इलाक़े में उसका प्रभाव बारीक चांद नहीं बल्कि चौदहवीं का चांद बन गया है।
शिया हिलाल का शब्द पहली बार जार्डन नरेश किंग अब्दुल्लाह द्वतीय ने दिसंबर 2004 में अपनी अमरीका यात्रा के दौरान वाशिंग्टन पोस्ट से एक वार्ता में किया था। यह उस समय की बात है जब सन 2003 में इराक़ पर अमरीका के हमले के बाद इराक़ में होने वाले चुनाव में शिया मुसलमानों को जीत मिली थी और उन्होंने बहुसंख्यक होने के बावजूद दशकों तक सत्ता के दूर रहने के बाद पहली बार सरकार गठन किया था। कुछ सूत्रों का यह भी कहना है कि वास्तव में इस्राईल ने, जार्डन नरेश किंग अब्दुल्लाह द्वतीय से कहा था कि वह " शिया क्रीसेन्ट" या " शिया हिलाल" बनने की बात करें।
शिया हिलाल और ईरान के प्रभाव की बात करना वास्तव में एक सोची समझी साज़िश का हिस्सा था और उसका मक़सद, इलाक़े के इस्लामी देशों को धर्म व मत के आधार पर एक दूसरे से लड़ा कर, अमरीका की इलाक़े में लंबी उपस्थिति और इस्राईल की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाना था। भीतरी समस्याओं और देश में सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामने कर रहे सऊदी अरब जैसे कई देशों ने इस साज़िश में सहयोग का स्वागत किया और इराक़ और सीरिया में तकफीरी आतंकवादियों द्वारा इस साज़िश को व्यवहारिक बनाने का काम आरंभ हो गया।
धर्म के नाम पर पूरे इलाक़े में विवाद फैलाने की इसी साज़िश के तहत इस्राईल भी मैदान में कूद पड़ा और उसने अरब देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरु कर दी और उन्हें यह समझाया कि उनका एक संयुक्त दुश्मन है जिसका नाम ईरान है। इसी संयुक्त दुश्मन से मुक़ाबले के लिए कुछ अरब और इस्राईली अधिकारियों के बीच खुफिया मुलाक़ातें भी हुई और इसी लुका-छिपी और इस्राईल व अरबों की खुफिया दोस्ती की वजह से ट्रम्प की यह हिम्मत हुई कि वह फिलिस्तीनियों की तबाही के समझौते का विचार पेश करें और उसे " द डील आफ सेंचुरी" का नाम दें।
यह सारे सपने उस समय टूट गये जब ईरान के नेतृत्व में प्रतिरोध मोर्चे ने इराक़ और सीरिया में तकफीरी आतंकवादियों को घूल चटा दी। प्रतिरोध मोर्चे केवल शिया मुसलमानों या ईरानियों पर आधारित नहीं है बल्कि एक ऐसा संयुक्त मोर्चा है जिसमें सभी धर्मों और जातियों से संबंध रखने वाले संयुक्त दुश्मन अर्थात इस्राईल के खिलाफ संघर्ष करते हैं। विभिन्न मोर्चों में इस संगठन की जीत की वजह भी यही है।
प्रतिरोध मोर्चे की विजय और अमरीका व इस्राईल की विफलता की वजह से यूएई और सऊदी अरब जैसे कई इलाक़े के देश अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश में नज़र आ रहे हैं और अब इस बात की संभावना बढ़ गयी है कि बगदाद में जल्द ही ईरान और सऊदी अरब के अधिकारियों के बीच एतिहासिक मुलाक़ात भी हो जाए।
यक़ीनी तौर पर अगर ऐसी कोई मुलाक़ात होती है और ईरान व सऊदी अरब के बीच अकारण दुश्मनी खत्म हो जाती है तो इस्लामी जगत की ऊर्जा एक दूसरे के खिलाफ खर्च होने के बजाए, संयुक्त दुश्मन अर्थात इस्राईल और ज़ायोनियों के खिलाफ खर्च होगी जो फिलिस्तीनियों और इस्लामी जगत के हित में है। शायद, इस्राईल के अस्तित्व की ओर से चिंता इस बात का कारण बनी कि ब्राइन हुक जैसे अमरीकी अधिकारी, ईरान और शियों से डराने के पुराने हथकंडे को फिर से आज़मा रहे हैं। दर अस्ल, अमरीकी अधिकारी, इस्लामी देशों के मध्य एकता और सऊदी अरब व ईरान के बीच दोस्ती के डर से शिया हिलाल के चौदहवीं के चांद में बदलने की बात कर रहे हैं ताकि इस प्रकार से शिया सुन्नी विवाद फैला कर इन देशों को एक दूसरे से दूर किया जा सके।